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शहपुरा समाचार मे प्रकाशित  खबर का असर, आयुष्मान कार्ड से खेल करने वाले दो दलाल पकड़ाये जांच में जुटा प्रशासन

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डिंडोरी जिले के शहपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में आयुष्मान भारत योजना के नाम पर लगाए गए एक कथित नेत्र शिविर ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा कर दिया है। निजी संस्था सुख सागर मेडिकल हॉस्पिटल व मेडिकल कॉलेज द्वारा मुफ्त मोतियाबिंद ऑपरेशन के नाम पर आयोजित यह शिविर बिना किसी अधिकृत अनुमति और विभागीय स्वीकृति के संचालित किया जा रहा था, जिससे पूरे मामले पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

शिविर की सूचना मिलते ही एसडीएम शहपुरा ऐश्वर्य वर्मा और पुलिस टीम ने मौके पर दबिश दी। थाना प्रभारी अनुराग जानदार के नेतृत्व में की गई कार्रवाई के दौरान आयोजकों से वैध अनुमति से जुड़े दस्तावेज मांगे गए, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर दो लोगों को हिरासत में लेकर थाने ले जाया गया, जहां उनसे पूछताछ जारी है।

प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि शिविर में इलाज से ज्यादा मरीजों के आधार कार्ड और आयुष्मान कार्ड का डाटा इकट्ठा किया जा रहा था। इसे लेकर फर्जी क्लेम और आयुष्मान योजना में धोखाधड़ी की आशंका जताई जा रही है। हैरानी की बात यह है कि बीएमओ और स्वास्थ्य विभाग को इस शिविर की कोई आधिकारिक जानकारी ही नहीं थी, जिससे इसकी वैधता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले राछो गांव के पास एक बस दुर्घटना में यह बात सामने आई थी कि क्षेत्र के मरीजों को भरकर सुख सागर हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था, लेकिन दुर्घटना के बाद संस्था ने जिम्मेदारी लेने से हाथ खींच लिए थे। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि निजी अस्पतालों के दलाल सक्रिय हैं, जो लोगों से आयुष्मान कार्ड और समग्र आईडी लेकर उन्हें जबलपुर जैसे शहरों में भेजते हैं और योजना के तहत कथित तौर पर फर्जी बिलिंग की जाती है।

अब शहपुरा में पकड़े गए इस अवैध शिविर ने इन आशंकाओं को और मजबूत कर दिया है। प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है, लेकिन जनता की मांग है कि सिर्फ आयोजकों पर नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई हो और यह साफ किया जाए कि आयुष्मान योजना के नाम पर कितनों का डाटा इकट्ठा हुआ और उसका दुरुपयोग तो नहीं किया गया।

शहपुरा का यह मामला सिर्फ एक अवैध शिविर तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि यह आयुष्मान योजना में चल रहे संभावित बड़े खेल की ओर इशारा कर रहा है। अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं—क्या सच्चाई सामने आएगी या मामला फिर कागजों में दबकर रह जाएगा।

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